अंग्रेजीराज का 1936 का राजस्व रिकार्ड है कमेटी के पास, लाखों लोग जुटते हैं हर साल उर्स पर यहां


भिलाई। कुतुब ए भिलाई हजरत सैय्यद बाबा रहमतुल्लाह अलैहि की दरगाह का चार दिवसीय उर्स गुरुवार 22 मई से शुरू हो चुका है। अंग्रेजी राज के दस्तावेजों के आधार पर यह जगह करीब 90 साल पहले से राजस्व रिकार्ड में दर्ज है। यहां का उर्स भी कौमी एकता की मिसाल है। यहां हर कौम व मजहब के लोग मिल कर उर्स पाक मनाते हैं। यहां हर समुदाय की आस्था है और चार दिवसीय उर्स में दूर-दूर से लोग आते हैं।
कुतुब ए भिलाई हजरत सैय्यद बाबा रहमतुल्लाह अलैहि की दरगाह कितनी पुरानी है, इस बारे में ज्यादातर लोग अंजान थे। लेकिन वर्तमान में मस्जिद-मजार से जुड़े लोगों ने यहां से जुड़ा ब्रिटिशकालीन राजस्व रिकार्ड निकाला है। जिसके मुताबिक साल 1936-37 में वर्तमान जगह को ‘सैयद बाबा का कबर स्थान’ के तौर पर दर्ज किया गया है। इसकी पुनरावृत्ति बाद के रिकार्ड में भी है।
भूपेश की दादी ने देखा था सैयद बाबा को
रेलवे से रिटायर हाजी हमीद अशरफी बताते हैं-बाबा यहां कब आए इस बारे में किसी को नहीं मालूम। वह खुद 1960 में भिलाई पहुंचे थे। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बड़े पिताजी और यहां के प्रमुख राजनीतिक-सामाजिक व्यक्तित्व श्यामाचरण बघेल तथा पचकौड़ दाऊ के पास तब हम लोग बैठा करते थे। तब खुद श्यामचरण बघेल बताते थे कि उन्होंने बचपन से यहां खुले में बनी कब्र देखी है और बाबा को नहीं देखा। हाजी हामिद के मुताबिक तब दाऊ श्यामाचरण बघेल की बुजुर्ग मां हम लोगों को बताया करती थी कि उन्होंने बाबा को देखा था। वह बताती थीं कि एक बुजुर्ग एक रोज सफेद घोड़े पर आए और इसी जगह ठहर गए। उसके बाद लोग उनके पास जाते थे। लोगों की दुख-तकलीफ दूर होती थी। हालांकि उन्हें भी सन साल की जानकारी नहीं थी लेकिन उनकी बातों से आभास होता था कि शायद 1920 से 1930 के बीच बाबा यहां आए होंगे।
बाबा ने कहा था-एक रोज सोना उगलेगी जमीन
हाजी हामिद खान अशरफी बताते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की दादी और दादा के दौर के लोगों ने सैयद बाबा को देखा है। हाजी अशरफी के मुताबिक बघेल की दादी उन्हें बताती थी कि बाबा ज्यादा किसी से बात नहीं करते थे। लोग उनके पास मुरादें लेकर जाते थे। इनमें ज्यादातर हिंदू ही होते थे क्योंकि तब यहां एक मात्र तेली परिवार के अलावा कोई मुस्लिम परिवार बसा नहीं था। स्व.श्यामचरण बघेल की मां से सुनी हुई बातों के आधार पर हाजी हामिद बताते हैं-बाबा यहां अक्सर पत्थर इकट्ठा कर जमा करते थे। उनसे कोई पूछता तो आज जहां भिलाई स्टील प्लांट है, उस तरफ इशारा कर बोलते थे-देखना एक दिन यह जमीन सोना उगलेगी और यही हुआ भी।
1965 के बाद होते गए तामीरी काम
हाजी हामिद खान अशरफी ने बताया कि सन 1965 के बाद उर्स का नियमित आयोजन होने लगा। तब मजार के चारों तरफ चटाई का घेरा था। बाद के दिनों में यहां मजार, मस्जिद और मीनार का काम जन सहयोग से होता गया औऱ् मजार-मस्जिद आज इस स्वरूप में है। हाजी हामिद बताते हैं कि चूंकि बाबा की वफात कब हुई, यह किसी को नहीं मालूम इसलिए यहां उर्स के लिए चांद की कोई तारीख नहीं है। कमेटी ने उर्स के लिए अप्रैल-मई का महीना लोगों की सुविधा को देखते हुए तय किया है।
हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है उर्स कमेटी, 10 साल अध्यक्ष रहे हैं डॉ. चंद्राकर
भिलाई-तीन स्थित सैयद बाबा का उर्स हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल है। यहां के प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ. जीएस चंद्राकर उर्स कमेटी में 1985 से 1995 तक अध्यक्ष रहे हैं। डॉ. चंद्राकर बताते हैं कि अंचल में दोनों समुदाय का भाईचारा बहुत मजबूत है और जब वह अध्यक्ष थे, तब भी आज की तरह सभी के सहयोग से उर्स के आयोजन होते रहे। तब कई नामी कव्वालों को बुलाया गया। डॉ. चंद्राकर बताते हैं यहां दूर-दूर से हर समुदाय के लोग आते हैं। वह खुद हर उर्स में अपनी तरफ से चादर चढ़ाने सपरिवार जाते हैं। डॉ. चंद्राकर बताते हैं कि बचपन में वह जनता स्कूल में पढ़े हैं और स्कूल की छुट्टी के दौरान सैयद बाबा की कब्र के आसपास हम सब बच्चे खेलते थे। बाद में जब 1980 में वह जीविकोपार्जन के लिहाज से दोबारा यहां पहुंचे तब रायपुर से सिकंदर अली यहां उर्स कमेटी में अध्यक्ष थे और उन्हे सचिव बनाया गया। बाद में सिकंदर अली रायपुर चले गए तो 1985 में लोगों ने मुझे अध्यक्ष बना दिया और यह जवाबदारी मैनें 10 साल तक निभाई।
छोटी सी कब्र थी, बाद में मजार बनाई गई
भिलाई स्टील प्लांट के सेवानिवृत्त डिप्टी मैनेजर हाजी मुनीर अहमद शाह बताते हैं जनवरी 1959 में वह अपने बड़े भाई के साथ भिलाई आए थे। तब 5 वीं पढ़ते थे। यहां भिलाई स्टेशन में बिजली नहीं थी। उन दिनों यहां मजार का रूप नहीं था। एक बेल का पेड़ था और उसकी छांव तले एक कच्ची कब्र बनी हुई थी। यहां पेड़ से गिरने वाले फल को लोग प्रसाद-तबर्रूक समझ कर ले जाते थे। लोगों का भरोसा था कि इस फल को खाने से मन्नत पूरी होती है। तब हम लोग सुनते थे कि कभी एक बुजुर्ग वहां बैठा करते थे। हालांकि कब उनकी वफात हुई, यह जानकारी नहीं हो पाई। हम लोगों ने वहां कब्र ही देखी है। बेल का पेड़ बाद में काट दिया गया था। इस मजार में शुरू से ही सभी धर्म के लोगों की आस्था रही है। आज भी यह परंपरा बरकरार है।