सोलर-असिस्टेड यात्री कोच के माध्यम से भारतीय रेल का हरित परिवहन की दिशा में एक और कदम, पारंपरिक विद्युत उत्पादन पर निर्भरता होगी कम


 

7 किलोवाट-पीक रूफटॉप सोलर सिस्टम से स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ऑनबोर्ड विद्युत सेवाओं की विश्वसनीयता में होगा सुधार

दिनांक – 09 अगस्त 2026

हरित रेलवे संचालन की दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए, भारतीय रेल ने उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज मंडल में सोलर-असिस्टेड यात्री कोच विकसित किया है। यह पहल ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी को पारंपरिक रेलवे कोचिंग स्टॉक के साथ एकीकृत करने को दर्शाती है।

विद्युत उत्पादन की पारंपरिक पद्धति क्या है?

परंपरागत रूप से, आईसीएफ यात्री कोचों में विद्युत शक्ति का उत्पादन कोच के नीचे लगाए गए एक्सल-चालित अल्टरनेटर के माध्यम से किया जाता है। कोच के एक्सल से जुड़े बेल्ट सिस्टम के माध्यम से यांत्रिक रूप से संचालित यह अल्टरनेटर कोच की बैटरी बैंक को चार्ज करता है और प्रकाश व्यवस्था, पंखे तथा मोबाइल चार्जिंग जैसी यात्री सुविधाओं के लिए विद्युत आपूर्ति करता है। यह प्रणाली दशकों से भारतीय रेल के लिए प्रभावी रूप से कार्य कर रही है, हालांकि यह ट्रेन की गति पर निर्भर करती है तथा इसमें यांत्रिक और विद्युत रूपांतरण के दौरान ऊर्जा हानि होती है।

सोलर कोच कैसे कार्य करेगा?

सोलर-असिस्टेड कोच इस व्यवस्था को और बेहतर बनाता है। कोच की छत पर लगाए गए उच्च दक्षता वाले सोलर फोटोवोल्टिक पैनल सूर्य के प्रकाश से सीधे विद्युत उत्पन्न करते हैं और कोच की बैटरी बैंक की चार्जिंग में अतिरिक्त योगदान देते हैं। दिनभर उपलब्ध सौर ऊर्जा का उपयोग करते हुए यह प्रणाली पारंपरिक एक्सल-चालित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता कम करती है और ऊर्जा के बेहतर उपयोग में मदद करती है।

पायलट कोच में लगभग 7 किलोवाट-पीक (kWp) क्षमता का रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाया गया है, जो कोच की विद्युत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन करेगा। ऊर्जा संरक्षण में योगदान के साथ-साथ यह प्रणाली पारंपरिक चार्जिंग व्यवस्था पर पड़ने वाले भार को कम करेगी और ऑनबोर्ड विद्युत सेवाओं की विश्वसनीयता बढ़ाएगी।

सोलर-असिस्टेड सिस्टम को एक आईसीएफ नॉन-एसी कोच में पायलट आधार पर स्थापित किया गया है। रूफटॉप सोलर प्लांट से प्रति वर्ष लगभग 13,400 यूनिट (kWh) स्वच्छ बिजली का उत्पादन होने की उम्मीद है, जिससे प्रति कोच प्रति वर्ष लगभग ₹2.80 लाख की बचत होगी। इससे प्रति कोच प्रति वर्ष लगभग 11 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भी कमी आएगी। पायलट परियोजना के प्रदर्शन के आकलन के आधार पर इस तकनीक का अन्य कोचों में चरणबद्ध तरीके से विस्तार किया जाएगा।

यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पारंपरिक कोच विद्युत उत्पादन ट्रेन की गति से प्राप्त यांत्रिक ऊर्जा पर निर्भर करता है, जबकि सोलर-असिस्टेड प्रणाली कोच की छत पर उपलब्ध नवीकरणीय ऊर्जा का सीधे उपयोग संभव बनाती है। यह अवधारणा पारंपरिक रेलवे कोचों को अधिक ऊर्जा-कुशल और पर्यावरण-अनुकूल बनाने की संभावनाओं को प्रदर्शित करती है।

यह परियोजना हरित पहल, तकनीकी नवाचार और ऊर्जा संसाधनों के कुशल उपयोग के प्रति भारतीय रेल की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है। पायलट स्थापना से प्राप्त अनुभव यात्री कोचिंग स्टॉक में नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के भविष्य के उपयोग के लिए महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराएगा।


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